अक्सर देखने में आता है कि दीपावली के कुछ दिन पूर्व देश भर के तथाकथित पर्यावरण संरक्षक 'से नो टु क्रेकर्स' जैसे नारों के साथ कुकुरमुत्तों कि भांति उग आते हैं. आश्चर्य की बात है कि पूरा साल इन लोगों को पर्यावरण के नुकसान की कोई चिंता नहीं होती और दीपावली के आसपास इनकी नींद खुल जाती है और ये अपनी दुकाने खोल कर चिल्लाना प्रारंभ कर देते हैं - 'पटाखों पर प्रतिबन्ध लगाओ'. इससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है. ध्वनि प्रदूषण हो रहा है, वायु प्रदूषण हो रहा है आदि आदि.
इन पर्यावरण के ठेकेदारों से कोई पूछे कि भैया जब आपके घर, परिवार या मोहल्ले में कोई शादी या अन्य समारोह होता है तो न केवल कार्यक्रम स्थल बल्कि आधा-एक किलोमीटर दूर तक उस आवाज़ को क्यों पहुंचाते हो, या आपके परिवार का कोई सदस्य तेज़ आवाज़ में म्यूजिक सिस्टम चला कर उसका आनंद लेता है और पडोसी परेशान होते है, तब ध्वनि प्रदूषण क्यों याद नहीं आता. जब आप अपने घर का कूड़ा या अन्य बेकार वस्तुओ को खुले में आग की भेंट चढ़ा देते हो तब वायु प्रदूषण की चिंता क्यों नहीं होती?
अपने आप को सभ्य दिखाने कि इस दौड़ में हमारे कुछ मोडर्न स्कूल भी शामिल हो गए हैं. ये अपने स्कूल के बच्चों को 'से नो टु क्रेकर्स' की तख्तिया लेकर एक छोर से दुसरे छोर तक घुमाते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और काम ख़त्म. पर्यावरण इनकी बला से जाये भाड़ में.
असल में कथनी और करनी में अंतर की बुरी आदत बच्चे को ऐसे कार्यक्रमों से ही मिलती है. बच्चे इधर 'से नो टु क्रेकर्स' की तख्तिया फेंकते हैं और घर जाकर अपने माता-पिता से खूब सारे पटाखे दिलाने की जिद करते हैं. आखिर करे भी क्यों न. बेचारे बच्चे तो पूरा साल भर से इस त्यौहार का इंतज़ार कर रहे होते हैं. बच्चों को यदि कुछ सिखाने की जरूरत है तो वो है पटाखों को सुरक्षित ढंग से चलाने की न कि पटाखे चलाने से रोकने की क्योंकि कि बच्चा इस बात को मानता ही नहीं और मानेगा भी नहीं.
ऐसा लगता है कि सरकार और सरकारी मशीनरी ने यह ठान लिया है कि जैसे कैसे भी हो हिन्दुओ की धार्मिक आस्था में हस्तक्षेप करो और हिन्दुओ को उनके धार्मिक रीति रिवाजों से दूर करो. इस काम में लार्ड मेकाले की शिक्षा पद्धति में अँधा विश्वास करने वाले और धर्म से विमुख हो चुके लोग उनका अनुसरण करने में लगे हैं.
इन तथाकथित पर्यावरण संरक्षकों ने सिगरेट के धुएं से हो रहे प्रदूषण के बारे में कभी आपत्ति की हो, ऐसा मुझे स्मरण नहीं होता. प्लास्टिक की थैलियों के खिलाफ कोई जनजागरण किया हो या वाहनों से हो रहे प्रदूषण के निदान के बारे में कभी चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से कोई ठोस कार्यवाही करने की बात की हो, मुझे नहीं लगता.
इसलिए बंधुवर, यदि पर्यावरण के प्रति आपकी चिंता असल में है तो दुनिया भर में क्रिसमस और ईसाई नववर्ष पर चलाये जाने वाले पटाखों पर भी प्रतिबन्ध लगवाने हेतु गंभीर प्रयास करें. क्या वो पटाखे शोर नहीं करते या फिर वे प्रदूषण मुक्त होते हैं. कृपया विचार करें और हमेशा दीपावली के आसपास बरसाती मेंढक की भांति चिल्लाना बंद करें. बच्चों को अपनी समृद्ध संस्कृति से जोड़ने का प्रयास करें तोड़ने का नहीं.